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Tuesday, 22 January 2013

राष्ट्र प्रेरणा के अमर स्त्रोत नेताजी सुभाष चन्द्र बोस

23 जनवरी
नेता जी सुभाष चन्द्र बोस जयंती पर विशेष
राष्ट्र प्रेरणा के अमर स्त्रोत नेताजी सुभाष चन्द्र बोस


नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का जीवन आत्म-उत्सर्ग की एक कहानी है। जो निर्जीव और हतोत्साहित व्यक्तियों में स्फूर्ती और आशा का संचार कर सकती है। नेता जी ने देश के स्वाधीनता संग्राम में अपने जीवन को समग्र न्यौछावर कर दिया। सुभाष बाबू ने आई.सी.एस. परीक्षा में चौथे नम्बर पर आकर सभी को अचंभित कर दिया। लेकिन देश की राजनीतिक उथल-पुथल। और देश भक्ति की आंधी से प्रेरित हो सुभाष ने आई.सी.एस. की नौकरी छोड़ दी। प्रिंस आफ वेल्स के स्वागत के बहिष्कार के सम्बंध में सुभाष चन्द्र बोस को पहली बार गिरफ्तार करके 6 माह की सजा दी गई। सुभाष दो बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए थे। उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष का पद सबसे बड़ा सम्मान था। जो भारतीय जनता अपने सर्व प्रिय नेता को दे सकती थीं। नामजद सदस्य पट्टाभि सितारमैया की पराजय पर स्वयं गांधी जी ने कहा था। वह उनकी हार है। गांधी जी से नेताजी का मतभेद नीति और साधन दोनों आधारों पर रहा। सुभाष चन्द्र बोस कांग्रेस की दक्षिण पंथी नीति से सदैव असंतुष्ट रहते थे। वह अपने संगठन को सदैव वामपंथी रखना चाहते थे। 
अंत में उन्होंने कांग्रेस को छोड़ दिया। और एक नवीन राजनीतिक दल फारवर्ड-ब्लाक की स्थापना की। वह उत्तर-पश्चिम सीमा-प्रांत और अफगानिस्तान के मार्ग से पहले रूस पहुंचे। उसके पश्चात जर्मनी। जहां हिटलर ने उनका स्वागत किया। वह मुसोलिनी से भी मिले। सुभाष चन्द्र बोस ने बर्लिन से ब्रिटेन के विरोध में प्रचार किया। जर्मनी द्वारा युद्ध में पकड़े गएं। भारतीय सैनिक बंदियों की एक प्रथक सेना संगठित की। जब जापान ने सिंगापुर को जीत लिया। तब सुभाष चन्द्र बोस ने दक्षिण-पूर्वी एशिया में भारतीयों की गतिविधियों के बारे में सुना। तभी वे वहां पहुंचे।
भारत के महान् क्रांतीकारी रास बिहारी बोस ने बैंकाक में भारत स्वतंत्रता लीग की स्थापना की। तिरंगे झण्डे को वहां लहराया। अपना लक्ष्य भारत की तुरंत और पूर्ण स्वतंत्रता रखा। सिंगापुर के पतन के पश्चात। अंग्रेजों ने 40 हजार भारतीय सैनिकों को जापान को सौंप दिया। जापान ने इन भारतीय सौनिकों कैप्टन मोहन सिंह को सौंप दिया। मोहन सिंह ने अपने थोड़े सैनिकों के साथ आजाद-हिन्द सेना का गठन किया। बाद में नागरिक भी इस सेना में सम्मिलित हुए। इस सेना के अधिकारी केवल भारतीय ही थें। निश्चय किया गया। यह सेना केवल भारत की स्वतंत्रता के लिए ही युद्ध करेंगी।
सुभाष चन्द्र बोस आजाद-हिन्द सेना के आमंत्रण पर जापान पहुंचे। जापान के प्रधान मंत्री टोजो ने उनका स्वागत किया। उसने सुभाष चन्द्र बोस को स्पष्ट किया। जापान भारत की स्वतंत्रता चाहता है। उसे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए। परंतु युद्ध के समय में भारत जापान की अधीनता में रहेगा। सुभाष चन्द्र बोस ने उनकी इस बात को स्वीकार कर लिया। नेता जी ने अंग्रेजों के विरूद्ध। भारत की स्वतंत्रता के लिए। संघर्ष करने। अपना पहला संदेश। भारतीयों को टोकियो रेडियों से दिया। सुभाष चंद्र बोस के सिंगापुर पहुंचने पर। भारतीयों और भारत स्वतंत्रता लीग ने भव्य स्वागत किया। पूर्वी एशिया के भारत स्वतंत्रता संग्राम की बागडोर रास बिहारी बोस ने सुभाष चन्द्र बोस को सौंप दी।
सुभाष चन्द्र बोस को आजाद हिंद सेना का सेनापति बना दिया गया। उसी समय सुभाष चन्द्र बोस नेता जी पुकारे गए। नेता जी द्वारा आवाज लगाई गई। दिल्ली चलों। इस आवाज ने सिपाहियों पर जादू का असर किया। वह दिन भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया। जब आजाद हिंद फौज की सेनाएं कोहिमा और मणिपुर के युद्ध में जुट गई। दो महीने में ही उनका आक्रमण उग्र हो गया। अंग्रेजी सेना को पीछे हटना पड़ा। सारे विश्व ने। सुभाष चन्द्रबोस की विलक्षण संगठन शक्ति का अनुभव किया। सुभाष ब्रिगेड, गांधी ब्रिगेड, नेहरू ब्रिगेड और आजाद ब्रिगेड में सेना का वितरण किया गया। कैप्टन लक्ष्मी सहगल की देखरेख में महिलाओं की अलग झांसी रानी रेजीमेंट थी। बच्चों की अलग टुकड़ी थी। बच्चों का यह दल अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुआ।
कुछ माह पश्चात उन्होंने सिंगापुर में स्वतंत्र भारत की एक अस्थाई सरकार की स्थापना की। इस सरकार ने मित्र राष्ट्रों से युद्ध की घोषणा कर दी। कुछ ही दिनों में स्वतंत्र भारत की इस अस्थायी सरकार को। जापान, जर्मनी, इटली, कोरिया, बर्मा, थाईलैंड, राष्ट्रीय चीन, फिलीपींस और मनचूरिया ने मान्यता प्रदान कर दी। राष्ट्रीय अभिवादन- जय हिंद। राष्ट्रीय मुहर और राष्ट्रीय चिन्ह- टीपू सुल्तान का शेर। राष्ट्रीय बैज, राष्ट्रीय गीत, शुभ, सुख चैन की बरसा। और न जाने कितनी राष्ट्रीय आवश्यकताओं की पूर्ती आजाद हिंद फौज में भारतीय रीति से की गई। साम्प्रदायिक एकता का जो आदर्श आजाद हिंद फौज ने उपस्थित किया। वह हमेशा स्मरणीय और अनुकरणीय है। जापान ने अंडमान-निकोबार द्बीप समूह को इस सरकार को सौंप दिया। आजाद हिंद सेना ने जापानियों के साथ मिलकर साहस से युद्ध में भाग लिया। असम में इम्फाल तक पहुंचने में सफलता प्राप्त की। परंतु उसके पश्चात उसे पीछे हटने के लिए बाध्य होना पड़ा। जापान को भी मित्र राष्ट्रों के सम्मुख आत्म समर्पण करना पड़ा।
कहा जाता है। सुभाष चन्द्र बोस कुछ जापानी अधिकारियों के साथ बैकांक से टोकियो जाने के लिए निकले। तभी उनके हवाई जहाज में आग लग गई। और सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु हो गई। दुनिया अवाक् रह गई। नेता जी युग-युग के लिए अमर हो गए। भारत की स्वतंत्रता के लिए किए गएं।
नेताजी के प्रयास विफल हुएं। फिर भी उनके प्रयासों ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई। आजाद हिंद फौज का नाम युगों तक अमर रहेंगा। पीठ पर सुरंगे बांधकर। जमीन पर लेटकर। ब्रिटिश टैंकों को उड़ाने वाले बाल सैनिकों। भूखे पेट या पत्तें खाकर छापा मारने वाले। गुलामी के घी से आजादी की घास को श्रेष्ठ समझने वाले सैनिकों। सोलह-सोलह घंटे तक युद्ध करके ब्रिटिश सेना के छक्के छुड़ा देने वाली रानी झांसी रेजीमेंट की महिला सैनिकों को युग-युग तक इतिहास में याद किया जायेगा। 
सुभाष चन्द्र बोस अभी तक भारत के एक राष्ट्रीय नेता स्वीकार किए जाते है। एक देश प्रेमी के रूप में भारतीय उन्हें हमेशा याद करते रहेंगे। आजाद-हिन्द फौज और उनके अधिकारियों के दिल्ली के लाल किले में हुए ऐतिहासिक मुकदमें ने सम्पूर्ण भारत में एक जन आन्दोलन को जन्म दिया। इस सेना के निर्माण से अंग्रेजों का विश्वास भारतीय सेना से उठ गया। इन सभी घटनाओं ने अंग्रेजों को भारत छोड़ देने के लिए प्रभावित किया।
( इदम राष्ट्राय स्वाह, इदम राष्ट्राय, इदम न मम् )

http://khabar.ibnlive.in.com/livestreaming/IBN7/            

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