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Friday, 27 December 2013

माँ : (स्मृति शेष)

रोता बिलखता छोड़कर चली गई


आपने माँ की चिता की राख के पास बैठकर रूदन किया है....!  आप रात में गहरी नींद में डरावने सपने देखने पर माँ को पुकारते है... ! बीमार या पीड़ा होने पर माँ को पुकारते है...... ! माँ को अथाह प्यार करते हुए भी। उसे छुपाने की आपने पीड़ा झेली है..... ! किसी सांसारिक द्वन्द। परेशानी में पड़ने पर रात के काले अंधेरे में माँ को स्मृति में लाकर जोर-जोर से रोया है.... ! आप मानते है। माँ को लगाई पुकार आपकी मित्र है। जो आपका उद्धार कर। संवेदनशील बना सकती है..... ! अगर नहीं। तो आप माँ को सच्चा प्यार करने का दावा खो देते है...... !
Dath - 12/12/2013
आज भी मेरे जेहन में वो सब जिंदा है। जब मां कैसे गरीबी के उस दौर में हमारा लालन-पालन करती रही। घर की खेती का काम। ऊपर से ना के बराबर पैदावार का 70 का दशक। ऐसे में पेट के लिए खेतिहर मजदूरी करने का काम भी माँ को करना पड़ता। मजदूरी मिलती देढ़ से दो रुपए। काम करना पड़ता दो पाली में। बारह घंटे। 25 पैसे कूढ़े (10 किलो) के हिसाब से मूंगफली तोड़ने जाना। हमें कमर में लटका लेना। पेड़ के नींचे बिठाकर काम में लगने माँ में धुन आज भी ताजा है। पानी बरसता बेसुमार। ठंड जमा देती थी ठोड़ी। बचपन के इस कठिन काल में देश स्वास्थ्य सेवाओं से कोसो दूर था। चेचक और खाज-खुजली से तो शायद किसी का बचपन बचता रहा हो। हैजा जैसी महामारी चाहे जब आ धमकती। पूरी रात खटमल मारना ग्रामीणों की रात की डिवटी। शर में बल-बलाते जुएं किसी को नहीं छोड़ती। रात में कच्चे मकान के आसपास टर-टर करते मेढ़क। और माँ का अपने बच्चों को सीने से लिपटाकर सुला लेना।
Dath 12 / 12 / 2013
 मतलब डर से महफूज। माँ बताती। बेटा जब तू छोटा था। तो गांव माता-चेचक का बड़ा प्रकोप आया। उसने छोटे बच्चों से गांव के गांव खाली करा लिएं। अपने गांव से तो बमुश्किल तू बचा। इसके लिए मैने मां (पहले चेचक को मां या माता कहते थे) की बड़ी सेवा की। तूझे बचाने। रात-दिन बिना नमक-मिर्च-बघार के रसोई चलाई। भूखे रही। हफ्तों-पखवाड़ों-महीनों सिर नहीं धोया। माता से चैत्र के दिन गाड़ी खींचने की मन्नते मांगी। तब जाकर आज तू जिंदा है। पढ़ते समय। आठवें दर्जे में ऐसा समय फिर आया। लेकिन फिर माँ एक बार मौत के मुंह से मुझे बाहर निकालने में कामयाब रही। पिता इलाज के लिए बदनूर (बैतूल)- आमला (amulation land of army) लेकर घूमे। रात में गाड़ी बैल जोते गए। धचक-धचक दचकों से गाड़ी अस्पताल पहुंची। बचने के आसार नहीं। जानलेवा दोष-बुखार-पसीना आया। हर पल। माँ का सर रखे हाथ ने ही तो आज दिखाया। आर्थिक हालात के चलते। मिडिल स्कूल के शिक्षकों ने इलाज के लिए कुछ पैसे इकठ्ठा कर पिता के हाथ में थमा दिए। कहने लगे बच्चा पढ़ने में होशियार है। इसे बचाना जरूरी है। क्लास में अव्वल जो आता है।
इन सबके बीच। मुझे इंतजार होता। माह के अंत में माँ तीस से
चालीस रूपए कमाकर लायेगी। और मै इन पैसों से अगली क्लास की नयी पुस्तके खरीदूगा। जल्दबाजी करता तो माँ समझाती। डाटती-डपटती। बेटा मैं फला के यहां पैसे मांगने गई थी। थोडे दिन बाद पुस्तके ले लेना। मगर नयी पुस्तके खरीदने का उल्लास रोके नहीं रूकता। कंवर चढ़ाने की बेकरारी। यह एक एक ठेठ किसान के बच्चे की पढ़ाई के प्रति उमंग और माँ के संघर्ष के बीच का दैवीय संतुलन ही था। जो उस बचपन को एक सींख दे रहा था। उसे इस समाज। अपने परिवार। सामंती व्यवस्था के विरोध में कुछ करने को उकसा रहा था। उसकी रग-रग में भरता जा रहा था। समाज के बीच की खाई भरने का जोश। माँ ने घोर कष्ट उठाकर भी अपने बच्चे को पढ़ने से नहीं रोका। बस यही वो बात थी। इसने मेरी जिंदगी में नये दिन का रास्ता खोला। हर मोड़ पर बस मेरे साथ थी। तो वो था माँ की गोद की वो यादें। जिसने जिंदगी को राह दिखाई। साहस दिया। जुनून दिया। ईमानदारी दी।
बस फिर क्या था। निकल पड़ा नये दिन की सुबह-सुबह दिनेश। अपनी धुंध में। माँ की ममता को साथी मान। गुरू मान। आठवी के बाद नौवी में पढ़ने गया। गांव से शहर। जो एक शहरी कसबा था। सारनी-पाथाखेड़ा। देश के अहम कोल क्षेत्रों में से एक। विद्युत उत्पादन का पॉवर सेक्टर एरिया। यहां मेरे दोनों बड़े भाई प्राइवेट नौकरी करते थें। पॉवर प्लांट में । मैं पहली बार। एक सुदूर पिछड़े इलाके के गांव- बिहरगांव से टाऊन पहुंचा। वो भी बिना जूते-चप्पल के नंगे पांव। पिक्चर फिल्म तो पहली बार देखी। वो भी गणेश उत्सव में खुले में विडियों में। फिल्म थी बेताब। साल 1981 का। माँ भाईयों से मेरी खोज खबर लेती रहती। कोई तकलीफ तो नहीं। वो आसपास के लोगों से पूंछती। दिनेश कैसा है। वो भाईयों के पास जो रहता है। हम सहोदरों के बीज ऐसी कोई बात नहीं। फिर माँ का चिंता कहो या प्यार। जो निरंतर प्रेरणा कारण बनता गया। कोई कमी नहीं। ऊपर से शर के ऊपर नारायण का हाथ। तो चिंता जैसी कोई बात नहीं। इसी कस्बे से मैने हायर सेकेंड्री पार की। अब आई कॉलेज की बारी। बस एक जुनून लेकर मै जा पहुंचा प्रदेश की राजधानी भोपाल। कॉलेज पढ़ने। जनवरी 1985 में। कदम रखते ही राजधानी में मिला गैस त्रासदी का गमगीन माहौल।
स्व निर्देश से बीएससी, गणित में एडमिशन लिया। उच्च शिक्षा में खर्च का बढ़ना लाजिम था। लेकिन दोनों भाईयों के मजबूत कंधे जो मुझे मिले थे। और कृषि में भी तो उत्पादन बढ़ गया था। सोयाबीन ने किसानों के पास पूंजी बनानी शुरू कर दी। ऐसे में माँ भी जब-तब मेरी मदद करती रही। जब भी मौका मिलता माँ मेरे हाथ रूपए पकड़ा देती। एमएससी, गणित तक की पीजी शिक्षा को मैने पार किया। अब बारी आयी मेरी शादी की। मुझे याद है। वो दिन। जब मां 20 वीं शताब्दी के अंतिम साल में दस हजार का कर्ज लेकर आयी। विवाह उपरांत उसमें से भी मां कुछ पैसे बचा ले गई। बस दे गई बहू को आशीर्वाद। मुझे एहसास है। मां का अपनी बहू के प्रति आत्मीय स्नेह का। उसे बस खुशी की उसकी बहू पीजी तक पढ़ी-लिखी जो है। साथ ही ग्रामीण परिवेश वाला सास का अनुशासन वाला डंडा।

समय गुजरता रहा। जिंदगी अपनी गति से उतार-चढ़ावों के थपेड़ों से रू-ब-रू होती यहां तक आ पहुंची। मां मौजूद होने का एहसास ही था। जो हर कदम पर साथ था। मां गांव में रहती। मैं भोपाल में। मैने तरीका निकाला। उसे एक मोबाईल खरीदवा दिया। यही वो आधुनिक माध्यम था। जो मुझे हर दिन मां की आवाज सुना सकता था। दुखद पहलू रहा। मां को ये दुनिया छोड़ते समय लम्बे समय तक पीड़ा झेलनी पड़ी। उम्र के आठ दशक पार कर चुकी थी मां। शरीर में अत्यंत कमजोरी आ गई। पूरा साल दूध पर काटती रही। मेरे लिए मां की पीड़ा असहनीय हो गई। रोजाना मैं उनकी आवाज सुन कशमसाता रहा। नियति के सामने सब लाचार। हर महीने पखवाड़े गांव जाता रहा। मां से मिलता रहा। बस एक बेबस बेटे की तरह। वो मुझे देखती। मैं उसे। दोनों कुछ नहीं कर पाते। ना ही कह पाते। सच यही था। उनका जाने का समय। मुझे और समय मां के बिना यहां रहना। मैं भी किसी का पिता। किसी का पति। तो किसी का भाई या चाचा जो था।
मां से बिछोह के कश्मकश भरे ये क्षण अदभूत अनुभूति देने वाले थे। ऐसे लग रहा था। जैसे मेरा सब कारणों के कारण भगवान से सरोकार हो रहा हो। आखिरकार मां आज मुझे। इस दुनियां में रोता-बिलखता छोड़कर चली ही गई। पंचतत्व में विलीन हो गई। मैंने भी आंसूओं को बिल्कुल नहीं रोका। आत्मा को पूरी तरह धूल जाने दिया। ये मेरे जीवन के अदभूत और विलक्षण अनुभूति के क्षण थे। जो मेरी जीवन पूंजी बनेंगे। जिन्हें मैं संजोकर रखूंगा। इन्हें मैं हर क्षण अपने सीने से लगाकर रखूंगा। यहीं मेरे मित्र बन। मुझे राह दिखायेंगे। मेरा आत्मबल बढ़ायेंगे। निडर बनायेंगे। माटी से जोड़ें रखेंगे। गलत काम करने से रोकेंगे।
    
( इदम् राष्ट्राय स्वा: , इदम् राष्ट्राय, इदम् न मम् )
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