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Tuesday, 28 June 2016

पिता का पुण्य स्मरण

पुण्य तिथि 29 जून पर विशेष 

मेरे परम पूज्यनीय पिता 2003 को अमर ब्रह्म ज्योति में विलीन होकर मेरे से सदा – सदा के लिए जुदा हो गयें ....... ! बस मेरे पास रह गयीं उनकी यादें , उनके नित्य कर्म। जो आज भी मुझे जीने के लिए आशा, उमंग, उत्साह और संवेदनशील सोच। आज पिता के छोटे – छोटे नित्य कर्मों ने मेरे जीवन मूल्यों को निखार उनकों मानवीय मूल्यों का बड़ा आकार दिया। पिता के संस्कारों ने मेरे जीवन को आधार दिया। आज पिता की पुण्य तिथि 23 जून पर उनका स्मरण।
   
मेरे पिता एक शुद्ध भारतीय ठेठ किसान थें। जन्म बीसवीं शताब्दी के लगभग दूसरे दशक में। अंग्रेजों के अधीन देश में शिक्षा आम लोगों से दूर होने के नाते पिता से शिक्षा कोसों दूर। मगर उनकें जीवन संघर्षों ने मुझे झकझोर कर रख दिया। मेरे पिता के पिता अर्थात् दादा के बचपन में गुजर जाने से उनके जीवन संघर्ष और बढ़ गयें। बचपन तत्कालीन आर्थिक जंजाल से गुजरा। घरेलू के साथ जमीदारी, पटेली व्यवस्था में एक खेतिहर मजदूर। अंदाजा लगाने से सिरहन अपने आप होती है। पूरे दिन भूखे पहले किसी बड़े किसान के यहां काम करते। तब जाकर शाम को दिन की मेहनत से कमाएं एक पाई अनाज से भोजन खां पाते। पेट की आग बूझ पाती। धीरें – धीरें उनके हौंसलों ने उनका एक छोटा संसार बसा दिया। जिसमें एक मां, हम तीन भाई और एक बहन चहल कदमी करने लगें। इस क्यारी को बगियां में बदलने में पिता को बड़े धैर्य से कदम आगे बढ़ाते हुए शीलता का परिचय देना। घर की थोड़ी सी पुस्तैनी खेती करने के साथ – साथ। तेली होने के नाते खेती के साथ – साथ नित्य कोल्हू (घानी) चलाकर तेल पीरोने का पुस्तैनी व्यवसाय करते। ढुल्ली सिर पर रखकर गांव – गांव जाकर खेड़ा करते। नमक और तेल बेचकर परिवार के लिए दो पैसा कमाते। अपनी कर्म भक्ति की धुंध (लगन) के बल पर धीरे – धीरे लघु एवं सीमांत श्रेणी के एक अच्छे किसान की कतार में आ खड़े हुएं। हम सूख से दो जून की रोटी खाने लगे। हम सभी भाई – बहनों के दो से चार – चार हाथ कर गृहस्थ जीवन में प्रवेश कराकर अपना संस्कार पूरा किया।
   

सबसे अधिक पिता जी की दैनिक दिनचर्या ने मेरे जीवन पर अमिट छाप छोड़ी। जिसने मेरे जीवन को एक ओर उत्साह और उमंग से भरा। दूसरी ओर उनके दैनिक कार्य मेरे जीवन मूल्य बनें। बिना किसी अध्ययन के। किसी के मार्ग बताये या सींखायें। पिता जी चाहे घर रहें या बाहर। जहां रहें। पिता जी रोजाना भोर में सुबह जल्दी उठते। अपने नित्य कर्म से निपते। नहाने (स्नान) से पहले मुंह धोकर सबसे पहले उदित (उगते) होते सूर्य को अर्ध्य (जल) चढ़ाकर नमन करते। सूर्य नारायण कहकर संबोधित करते। पूरे दिन काम करने के लिए उनसे आशिर्वाद लेते। उनकी जय जयकार करते। इसके बाद अपना रोजाना का काम शुरू करते। पूरी तरह सादगी से भक्ति, नमन्। किसी प्रकार की बाधा नहीं। बंधनों से पूरी तरह मुक्त। ईश्वर नाम के आगे एक ठेठ किसान ने स्नान की अनिवार्यता को आड़े नहीं आने दिया। बस ईश्वर नाम ही सर्वोपरी। उसके बाद काम शुरू। उनकी इस विशेषता को उनके आसपास चहलकदमी करते हुए मैंने भी आत्मसात कर लिए। स्वभावत: पितृ संसकार वश। बचपन से। आज मेरा रोजाना ब्रह्म मूर्हत में या कम से कम भोर में अवश्य बिस्तर छूट जाता है। ताजी जीवन लेने चहल कदमी करने लगता। चहंचहाट सुनकर चहके लगता। नमन् करता हूं। पाठ करता हूं। मेरा दैनिक जीवन, जीवन ऊर्जा से भर जाता। अगला बढ़ता कदम अपने काम की ओर। आज मेरी मानसिक आयु 50 वर्ष की होने पर मुझे लगता है, पिता की एक छोटी सी सादगी मेरे साथ – साथ दुनियां के लिए एक कितना बड़ा संदेश दे गई। आज मेरा पूरा प्रदेश सूर्य नमस्कार की पहल को आगे बढ़ा रहा है। नरेन्द्र मोदी ने देश के प्रधानमंत्री बनते ही वीडियों कांफ्रेंसिंग के जरिए देश के बच्चों से सबसे पहले कहा, ऐसे बच्चे हाथ उठायें, जिन्होंने उगता सूरज देखा है। दुख। किसी बच्चें ने हाथ ऊपर नहीं किया। काश हर पिता नमन् करता। आज देश ही नहीं सार विश्व भारतीय योग स्थान दे चुका है। अहम को समझ चुंका है।
   
दूसरी छोटी। किन्तु मेरे लिए अहम्। बात ....... । पिता जी को जहां कहीं भी। उन्हें यदि कहीं रोटी का एक टुकड़ा भी मिल जाता तो वे उसे उठाकर सबसे पहले नमन् करते। इसके बाद उस रोटी के टुकड़े से एक नाममात्र का अंश तोड़कर ग्रहण करते / करवाते। अन्न को ईश्वर तुल्य बतातें। कहते ऐसा आदर भाव रखने से कोई अन्न से वंचित नहीं रह सकता। आज भी पिता का ये सामान्य किन्तु असाधारण काम मेरे को गहराई तक प्रभावित करता है। बिना सींख लिए व्यक्ति के एक नैतिक काम इतनी क्षमता। जो पीढ़ी दर पीढ़ी नैतिक संस्कारों को आगे बड़ा सकता है। उसकी ये साधारण यादें सदियों के लिए नैतिक धरोहर बन सकती है।
    पिता जी की तीसरी बात मुझे सबसे अधिक स्पर्श करती है। वो है। पिता जी कोई भी खाने की वस्तु विशेषकर नारियल। खुद नहीं खाते। महीनों तक अपने जेब में रख लेते। इसके बाद समय – समय पर हम भाई – बहनों को उसका थोड़ा – थोड़ा अंश तोड़कर प्यार से देते। ये सामान्य प्रक्रियां महीनों चलती। हम भाई – बहन को जब भी याद आती हम बड़े प्यार से नारियल मांगते। आज भी अपनी संतानों के प्रति एक पिता का असीम प्यार मुझे याद आता है। ह्रदय को हिलाकर मानवीय संवेदनाओं को उत्पन्न कर देता है।
    पिता के साथ एक सामान्य जीवन जीकर लगा। समाज के सामान्य मुद्दें सुलाझाने के लिए किसी प्रकार की शिक्षा – दीक्षा की जरूरत नहीं होती। बस आवश्यक है। निडरता, निष्पक्षता, ईमानदारी, नैतिकता और जन्मजात गुण बुध्दि की। लोग आपके पास खींचे चले आयेंगे। व्यक्ति सार्वजनिक बन जायेंगा। पिता जी में इन्हीं गुणों के होते गांव के पटेल उन्हें अपने मुख्य सलाहकार के तौर पर अपने साथ रखते। चिंतन – मनन करते। जमीन जायजाद बंटवारें। पारिवारिक उलझने हल करने। पिता जी को ढंढतें। कहते एक व्यक्ति है जो दिमाग से तार्किक, उचित, निष्पक्ष आवाज उठाकर हल देने में सहयोग कर सकता। आज मेरे भीतर इन्हीं गुणों का असर देखने को मिलता है। मेरे लिए पिता के अदभूत गुण कुछ नया करने का बल, प्रेरणा, मार्ग दिखाते हैं। मेरे लिए आज ये छोटी – छोटी बातें आदर्श के तौर पर एक उत्प्रेरक का काम करते हैं। इन्हीं चन्द बातों ने आज मुझे भिन्न बनाया। मुझे लगता है आज मैं पिता का सच्चा ऋणी हूं।

   
परिवार की जीवन यात्रा चलती रहीं। पहले मैं, उसके बाद मेरा भाई भोपाल आ गयें। पिता जी ने अब खेती का काम छोड़ दिया। संवेदनाओं को खोते ग्राम्य और पारिवारिक जीवन से पिता जी उदासीन होने लगें। इसके चलते वे भोपाल में आकर हमारे साथ रहने लगें। शहरी जीवन ढलते गए। अहस्तक्षेप का एकाकी शहरी जीवन ही उन्हें अच्छा लगने लगा। हमारी सीमित आय में ही उन्होंने अपने आप को ढाल लिया। आगे चलकर उन्हें पेस्ट्रीटाइड की घातक बिमारी ने उन्हें घेर लिया। मैं हर जगह चाहे वो आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक और एलोपैथिक डॉक्टर हो के पास इलाज के लिए ले गया। यहां तक की तांत्रिक और भगत के पास भी। इलाज करने वाले सभी कहने लगे दादा आपकों बच्चें निःसंकोची मिले हैं। ये आपके लिए एक बड़ा वर्दान है। पड़ोसी भी कहते आपकी सेवा करने में या आपसे कोई शर्म नहीं करते। यहीं जीवन की अहम उपलब्धी है। लंबे समय तक यूरिन बंद होने से, डॉक्टरों के मना करने के बावजूद, अधिक उम्र में भी आपरेशन करना पड़ा। ऑपरेश करने के बाद लगभग एक पखवाड़ा पिता जी जिन्दा रहें। श्री भगवान सच्चिदानन्द की इच्छा अनुसार अन्ततः पाइजन क्रिएट (बनने) होने के कारण 29 जून 2003  को पिता जी अमर ब्रह्म ज्योति में विलीन हो गयें। भगवान उनकी आत्मा को परम शांति प्रदान करता रहें। उनके आदर्श हमारे से कभी दूर न हो ..... ! यही मेरी, परिवार की, पिता जी की दिवंगत आत्मा के प्रति सच्चि श्रद्धांजलि होगी। आज भी मैं स्थिति अनुसार पुण्यतिथि पर, हर साल पवित्र नदी नर्मदा में स्नान कर या किसी अन्य तरीके से पिता जी का पुण्य स्मरण करता हूं, करता रहूं, इसी मनोकामना के साथ .......... !                 

Wednesday, 13 April 2016

मेरे केन्द्र बिन्दु



हारिये न हिम्मत, विसारिये न हरि नाम।
सीताराम, सीताराम, सीताराम कहियों ।।
जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहियों।

होहिये वही वही, जो राम रचि राखा।
को तर्क करिहिं बढ़ावहि साखा।।  
                                  .......... बालकाण्ड
                                      रामचरित मानस

प्रबल प्रेम के पाले पड़कर, प्रभु का नियम बदलते देखा।
अपना मान भले टल जाये, भक्त का मान न टलते देखा।